मास्टर्स एथलेटिक्स: कोई उम्र नहीं, लेकिन उत्साह


 

मास्टर्स एथलेटिक्स : उम्र नहीं, उत्साह की जीत

वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानपूर्ण जीवन का विश्वव्यापी अभियान

लेखक : बलवन्त सिंह बिष्ट
सदस्य, देवभूमि मास्टर्स एथलेटिक्स एसोसिएशन, उत्तराखण्ड

"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।" — संत कबीर

मनुष्य की आयु बढ़ना प्रकृति का नियम है, परन्तु उत्साह, साहस और कर्मठता का वृद्ध होना आवश्यक नहीं। आज विश्व के लाखों वरिष्ठ नागरिक इस सत्य को अपने जीवन से सिद्ध कर रहे हैं। वे 70, 80, 90 और 100 वर्ष की आयु में भी ट्रैक पर दौड़ रहे हैं, गोला, चक्का और भाला फेंक रहे हैं तथा विश्व मंच पर अपने देश का गौरव बढ़ा रहे हैं। यह प्रेरणादायी आंदोलन मास्टर्स एथलेटिक्स के नाम से जाना जाता है।

मास्टर्स एथलेटिक्स केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन, आत्मविश्वास, अनुशासन और सक्रिय वृद्धावस्था का वैश्विक अभियान है। इसमें 35 वर्ष से अधिक आयु के खिलाड़ी पाँच-पाँच वर्ष के आयु वर्गों—35+, 40+, 45+, 50+, 55+, 60+, 65+, 70+, 75+, 80+, 85+, 90+, 95+ और 100+—में भाग लेते हैं। समान आयु वर्ग में प्रतियोगिता होने से निष्पक्षता बनी रहती है और प्रत्येक खिलाड़ी पूरे उत्साह से अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है।

विश्व स्तर पर इस आंदोलन का संचालन World Masters Athletics (WMA) तथा एशिया में Asia Masters Athletics (AMA) करती हैं। भारत में Masters Athletics Federation of India (MAFI) इसकी राष्ट्रीय संस्था है, जिसकी स्थापना 1990 में हुई। यह संस्था पूरे देश में मास्टर्स एथलेटिक्स को संगठित करती है तथा भारतीय खिलाड़ियों का चयन एशियाई एवं विश्व प्रतियोगिताओं के लिए करती है।

उत्तराखण्ड में देवभूमि मास्टर्स एथलेटिक्स एसोसिएशन, देहरादून राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन करती है। राज्य प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेते हैं और वहाँ से योग्य खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त करते हैं।

इन प्रतियोगिताओं में 100 मीटर से लेकर लंबी दूरी की दौड़, रेस वॉक, ऊँची कूद, लंबी कूद, ट्रिपल जंप, गोला फेंक, चक्का फेंक, भाला फेंक, हैमर थ्रो और रिले जैसी अनेक स्पर्धाएँ होती हैं। प्रत्येक खिलाड़ी सामान्यतः अधिकतम तीन स्पर्धाओं में भाग लेता है।

मास्टर्स एथलेटिक्स का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक—तीनों स्तरों पर सशक्त बनाता है। नियमित अभ्यास से हृदय स्वस्थ रहता है, मांसपेशियाँ और हड्डियाँ मजबूत होती हैं, मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा मोटापे जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है। मानसिक रूप से आत्मविश्वास बढ़ता है, तनाव घटता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।

इस खेल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भाग लेने के लिए पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी होना आवश्यक नहीं। अनेक लोग 60 या 70 वर्ष की आयु में अभ्यास प्रारम्भ करते हैं और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते हैं। भारत की मान कौर (101 वर्ष), रीथ अब्राहम, पाकिन्दर सिंह और वी. श्रीरामुलु (101 वर्ष) जैसे खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर यह सिद्ध किया है कि आयु कभी भी सफलता की सीमा नहीं होती।

मैं स्वयं 73 वर्ष की आयु में देवभूमि मास्टर्स एथलेटिक्स एसोसिएशन, उत्तराखण्ड का सदस्य हूँ। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद मैंने अनुभव किया कि खेल केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन को भी युवा बनाए रखते हैं। नियमित अभ्यास ने मुझे अनुशासन, आत्मविश्वास और जीवन के प्रति नई आशा दी है। विभिन्न राज्यों के खिलाड़ियों से मिलना, उनके संघर्ष और उपलब्धियों को जानना तथा मित्रता का विस्तार करना मेरे जीवन की अमूल्य उपलब्धियों में से एक है।

मेरा विश्वास है कि DAY CARE, अल्मोड़ा जैसी संस्थाएँ यदि अपने सदस्यों को प्रातः भ्रमण, योग, हल्का व्यायाम और मास्टर्स एथलेटिक्स के प्रति प्रेरित करें, तो अनेक वरिष्ठ नागरिक नई ऊर्जा के साथ जीवन जी सकेंगे। यह केवल खेल नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज निर्माण का अभियान है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम वृद्धावस्था को असहायता का नहीं, बल्कि अनुभव, आत्मबल और प्रेरणा का काल मानें। जीवन का प्रत्येक दिन ईश्वर का उपहार है। यदि हम शरीर को सक्रिय रखें, मन को प्रसन्न रखें और समाज से जुड़े रहें, तो वृद्धावस्था भी जीवन का स्वर्णिम अध्याय बन सकती है।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें—

"उम्र नहीं, उत्साह मायने रखता है।
रुकना नहीं, चलते रहना ही जीवन है।
स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनें।"

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